Monday, 18 July 2016

पथ-प्रदर्शक

स्याह मार्ग में दिशा दिखाते,
राह बताते हैं, पथ-प्रदर्शक।
अन्तिम पग तक साथ निभाते,
कहीं न जाते हैं, पथ-प्रदर्शक॥

नयी राह में, नये रूप में,
कार्य तो वही करते हैं।
दिशा दिखाकर सबको, शायद
खुद खोने से डरते हैं॥



भ्रमित पथिक को अँधियारे में,
आशा भी तो देते हैं।
जैसे कहते चले-चलो तुम,
साथ में हम हो लेते हैं॥

नीरव तम में राहगीर के,
साथ-साथ चल पड़ते हैं।
गिरे हुए को आशा देकर,
पुनः उठाते हैं, पथ-प्रदर्शक॥


घोर अँधेरे, खड़े अकेले,
राह प्रकाशित करते हैं।
राही जाए जहाँ-जहाँ,
हर जगह उपस्थित रहते हैं॥

‘भोर’ काल से दिन संध्या तक,
एक जगह जड़ रहते हैं।
अँधियारे में बोलें, उजियारे में
कुछ न कहते हैं॥

हर मानव को भेद बिना,
सीने से लगाते हैं, पथ-प्रदर्शक।
अन्तिम पग तक साथ निभाते,
कहीं न जाते हैं, पथ-प्रदर्शक॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’



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Sunday, 19 June 2016

पापा

हँसता मुझको देख के मन में,
खुश हो जाते हैं पापा।
बाहर से हो ठोस, ह्रदय का,
भेद छुपाते हैं पापा॥

उँगली का सहारा लेकर मैंने,
पहला कदम बढ़ाया था।
और पापा को बने सहारा,
अपने पीछे पाया था॥

अपने कंधों पर मुझे बिठाकर,
इधर-उधर ले जाते थे।
जिस वस्तु की पड़े ज़रूरत,
बिना कहे ले आते थे॥



गलती हो जाने पर हल्की,
डाँट लगाते हैं पापा।
बाहर से हो ठोस, ह्रदय का,
भेद छुपाते हैं पापा॥

हँसते-हँसते दूर भेज कर,
भीतर मन में डरते हैं।
मेरी तुलना मूल्यवान,
अनमोल रत्न से करते हैं॥

ज्वर आने पर दौड़े- दौड़े,
देखरेख भी करते हैं।
मैं जागूँ तो मेरे पीछे,
रात-रात भर जगते हैं॥



बीमारी में भी खुद को हर-पल,
ठीक बताते हैं पापा।
बाहर से हो ठोस, ह्रदय का,
भेद छुपाते हैं पापा॥

हर बात को समझा करते हैं,
हर ज़िद भी पूरी करते हैं।
कमी न रहे किसी चीज की,
सदा ये चिंता करते हैं॥

घर भर की परेशानी में भी,
ठोस बने मुस्काते हैं।
कभी-कभी पर ‘भोर’ की ख़ातिर,
नेत्र सजल हो जाते हैं॥



मुझ पर हर पल वैभव अपना,
खूब लुटाते हैं पापा।
मुझको अपनी दुनिया, अपना,
शहर बताते हैं पापा॥

हाँ! बाहर से हो ठोस, ह्रदय का,
भेद छुपाते हैं पापा॥





©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Thursday, 9 June 2016

बिन मौसम बरसात!

बिन मौसम बरसात आज तो,
कई पाप करवाएगी।      
पुनः आज उसकी यादों में,
सराबोर कर जाएगी॥

मैं देख घटाएँ काली-काली,
उसका चेहरा मँढ़ता हूँ।
उसकी बातें पुनः याद कर,
स्वयं के मन से लड़ता हूँ॥




बिजली की लकीरें मेघों में,
जुल्फ़ों को उकेरा करती हैं।
उन जुल्फ़ों की सुन्दरता से,
रूप-परी भी डरती है॥

गरज़ घनों की रह-रह कर के,
मन विचलित कर जाती है।
धरा से मिलती हर इक बूँद भी,
उर में रोष भर जाती है॥




हवा ये ठंडी मुझको छूकर,
स्पर्श उसका दे जाती है।
पत्तों पर वर्षा की ध्वनि भी,
दिल मेरा ले जाती है॥

‘भोर’ पयोधर झर-झर बरसें,
मन का शोर दबाने को।
पर उसकी यादें रह-रह कर,
आतीं मुझे सताने को॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

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Sunday, 8 May 2016

मेरी माँ…

मेरे दु:ख में आँसू अपने,
ख़ूब बहाती मेरी माँ।
मैं खुश हूँ तो, मुझसे ज्यादा,
खुश हो जाती मेरी  माँ॥

सच्चाई का हर पल मुझको,
पाठ पढ़ाती मेरी माँ।
गलती हो तो पास बिठाकर,
है समझाती मेरी माँ॥

मुझे देख कर पल-पल मेरी,
चिंता करती मेरी माँ।
दूर शहर में मुझे भेज कर,
मन में डरती मेरी माँ॥



गृह-कर्मों में दक्ष है वह,
औ हरा समय को देती है।
वह अपना सर्वस्व लुटाकर,
वापस कुछ न लेती है॥

हँसती मुझे हँसाने को,
पर चिंता करके रोती है।
हर रात बिस्तर पर जा कर,
मुझे याद कर सोती है॥



कभी बुखार हो मुझको तो,
वह रात-रात भर जगती है।
भूख-प्यास में खाना खाया,
कह कर मुझको ठगती है॥

खुद को परेशानी हो कितनी,
पर चुप रहती मेरी माँ।
पूरे दिन का काम ख़त्म कर,
उफ़! न कहती मेरी माँ॥




पर उस माँ का वर्णन पूरा,
कैसे अब यह ‘भोर’ करे।
वश चले धरा पर, चीख़-चीख़ कर,
व्याख़्यान चहुँ ओर करे॥

किस्मत ग़र वह लिखती,
केवल खुशियाँ लिखती मेरी माँ।
दु:ख बचता तो स्वयं छोड़ कर,
देती किसको मेरी माँ॥

दुनिया भर भगवान को माने,
मैं जानूँ बस मेरी माँ।
पूजूँ उस भगवान से पहले,
पूजे जिसको मेरी माँ॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Sunday, 1 May 2016

हँसाने वाले…

हर दिन हर किसी को,
मुस्कान बाँटते हैं।
हँसते हैं ख़ुद अपना,
दर्द ढ़ाँपते हैं॥

तन्हाईयों में आकर,
देखना किसी कोने में।
कैसे रोते हैं,
सबको हँसाने वाले॥

हर पल हर किसी को,
सताया करते हैं।
खुशियाँ बाँटते हैं, ख़ुद
मुस्कुराया करते हैं॥

धीमे से पूछना कभी,
जब अकेले हों।
ख़ुद परेशाँ हैं,
सबको सताने वाले॥
ख़ुद कहकहा बन कर,
हँसाते हैं सबको।
बिगड़े कोई बात,
समझाते हैं सबको॥

कुछ पल हमदर्दी के,
उनको भी चाहिए।
ख़ुद से रूठे हैं,
सबको मनाने वाले॥

वो चाहते हैं कोई उनकी,
मुस्कुराहट जान ले।
सराबोर नीर में,
आँसू पहचान ले॥

‘भोर’ की शुरुआत से,
देर साँझ, निशा तक।
छिप के रोते हैं,
ख़ूब मुस्कुराने वाले॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Wednesday, 6 April 2016

चक्र

नयन झरोख़े सम्मुख दृढ़ हैं,
बाट टोहते जीवन की।
वह जीवन जो आ समीप कर,
चुरा नज़र मुड़ जाएगा॥

चारदीवारी तक सीमित जो,
बिखरा-सा संसार पड़ा है।
समय-चक्र पर नज़र टिकाए,
वह तम से जुड़ जाएगा॥




कुछ बातें उसकी मधु-भीनी,
कुछ नीरव अनुभव उसके।
कुछ तिक्त-कटु बातें कह कर,
वसुधा में लीन हो जाएगा॥

बन्द किवाड़ों के इस ओर,
दशा जीर्ण-शीर्ण दयनीय।
नज़र पड़ेगी जब तक उस पर,
मलिन-हीन हो जाएगा।।




न चैन, ठहर कर सोच सके,
न जगह, गति का साथ करे।
कुछ लम्हों में ही छोड़ तनाव,
वह काफ़िर हो जाएगा॥

न हाथ बढ़ा, न साथ मिला,
संकीर्ण क्षेत्र, सीमित सुविधा।
मंद-मंद अग्रिम होता वह,
खुद माहिर हो जाएगा॥




दिशा भटकता देख-जान कर,
माया में खो जाएगा।
सफ़र छोड़ कर मध्य में ही वह,
‘भोर’ रहते सो जाएगा॥





©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Sunday, 28 February 2016

हाँ छुपाना सीखा है…

मुझे खुद से वाक़िफ़ कराने वालों,
ज़रा ठहरो कि नमक कुछ कम है।
मुझे खुद मे ही रहने का हुनर फ़िर से न दो,
बड़ी मुश्किल से मैंने ज़रा मुस्कुराना सीखा है॥

नफ़रत है मुझे अपने उस पहलु से,
जो दिल भी लगाता था,कह भी न पाता था।
कह लेने दो मुझको आज, जो कुछ भी है,
बड़े दर्द में मैंने यूँ दिल लगाना सीखा है॥

जख़्मों को हवा देकर उजागर जो किया है,
मयस्सर करायी मुझको मेरी सच्चाई।
बस करो अब, कि हर कोई जान लेगा,
कैसे किश्तों में मैने जो ग़म छुपाना सीखा है॥


आज मेरे आँसुओं की वज़ह मत पूछना,
ये भारी हैं, बस यूँ ही निकल पड़ते हैं।
भीतर से जानने की कोशिश न करना,
हाँ, आँसुओं को बूँद पानी की बताना सीखा है॥

रुक जाऊँ कहीं पर, तो न समझना थक चुका,
साँस लूँ मै दो घड़ी, तो न समझना निर्बल हूँ।
साथ-साथ चलने को भी मत कहा करो कभी,
हाँ, ख़ुद से ही राहों पर लड़खड़ाना सीखा है॥

‘भोर’ की आशा दिखाकर, झूठ को सच मत कहो,
मत कहो कि बोल दो, या मत कहो खुद में रहो।
आसमाँ में रात मैंने अन्धेरा ही देखा है,
अपने ग़म गुपचुप स्वयं से बड़बड़ाना सीखा है॥


हाँ, ढेर मुश्किल से ज़रा-सा मुस्कुराना सीखा है॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Monday, 22 February 2016

नक़ाब

छोटी-सी इस दुनिया में,
दाग-ए-ग़म कुछ गहरे हैं।
मत यकीन करना ऐ दिल,
यहाँ सभी नक़ाबी चेहरे हैं॥

लाख़ लोग दस लाख़ हैं चेहरे,
कौन सत्य है कौन प्रपंच।
असमंजस में है यह दिल,
यहाँ सभी नक़ाबी चेहरे हैं॥





हर मानव इस दुनिया में,
कई चेहरे लेकर चलता है।
पर असली जो चेहरा है,
वह रोता है, वह हँसता है॥

मानव ऊपर से चेहरे लेकर,
वह चेहरा ढँकता है,
हर बात, हर पल के लिए,
वह अलग से चेहरा रखता है॥




छल प्रधान यह दुनिया है,
प्रत्येक कर्म दिखावा है।
भीतर के हैं भेद अलग,
चेहरा तो मात्र छलावा है॥

‘भोर’ समय से देर निशा तक,
स्वार्थ के साजिश सेहरे हैं।
मत यकीन करना ऐ दिल,
यहाँ सभी नक़ाबी चेहरे हैं॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Sunday, 14 February 2016

शायद…

शायद तुझसे मिल जाउँगा,
भूले-बिसरे गीतों-सा।
मिलकर तुझसे खूब लड़ूँगा,
रुठे-बिछड़े मीतों-सा॥               

पुनः मिलन की चाह तो है,
उम्मीद न है इन आँखों में।
पर चाहूँगा तेरे मन में,
बसा रहूँ संगीतों-सा॥





बार-बार तुझसे लड़ना हो,
जीत कभी न मेरी हो।
प्रेम-युक्त हर हार में पर,
उद्घोष सदा हो जीतों-सा॥

जीवन में तम घोर कभी हो,
हर कोई इक दीपक चाहे।
दुआ यही तेरे जीवन में,
बचा रहूँ उन दीपों-सा॥





कोशिश करके तोड़ दे रस्में,
कदम ज़रा इस ओर बढ़ा।
वादा है, मैं यहीं रहूँगा,
नव-निर्मित कुछ रीतों-सा॥

आज ‘भोर’ है तेरे सम्मुख़,
कल क्या होना किसे पता।
शायद धुँधला पड़ जाऊँगा,
भूले-बिसरे गीतों-सा॥





शायद पन्नों में रह जाउँ,
मैं बिगड़े संगीतों-सा…।




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Tuesday, 12 January 2016

कह देना…


मेरी तरह कोई तुझसे इतना,
प्यार करे तो कह देना।
दिल तेरा इस बात से ग़र,
इनकार करे तो कह देना॥

यूँ तो तेरे आशिक़ हर पल,
तेरे पीछे लगे रहे।
पर मुझ-सा कोई एक बार,
इज़हार करे तो कह देना॥




मैं तो अपने दिल की भाषा,
हर पल तुझसे कहता हूँ।
तेरा दिल भी एक बार,
इकरार करे तो कह देना॥



मेरा मन तो तेरी ख़ातिर,
कई पाप कर जाता है।
तेरा मन ग़र कभी जो,
भ्रष्टाचार करे तो कह देना॥

‘भोर’ की ख़ातिर तेरा मन,
झंकार करे तो कह देना।
इसी तरह कोई तुझसे इतना,
प्यार करे तो कह देना॥


©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Sunday, 22 November 2015

सफ़र…

अन्तहीन-सी राहों में,
चलता रहे कुछ यूँ सफ़र।
न किसी की फ़िक्र मन में,
न किसी की हो ख़बर॥

न रुके, चलता रहे,
न कभी मन्जिल मिले।
दर्मियाँ बस बातें हों,
मन चले हो बेसबर॥





कभी सरपट, कभी धीमे,
कभी गोल-सा चक्कर लगा के।
सफ़र जीवन को दर्शाये,
मस्ती हो कुछ इस कदर॥




कुछ गीत हों, संगीत हों,
कुछ कहकहे नये पुराने।
कुछ अनकही ख़ामोशियाँ,
जो छोड़ दें दिल पे असर॥

कुछ ‘भोर’ की बातें हों तुमसे,
कुछ तुम्हारी भी सही।
कुछ दुनियाभर का पागलपन,
मिले न जो दर-बदर॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Wednesday, 7 October 2015

वर्णन…

रिमझिम होती बारिश अब तो,
भेद दिलों के खोलेगी।
देखना तुझसे मिलकर तुझको,
हाल हमारा बोलेगी॥                 

इक बार ज़रा वर्षा-मोती में,
सराबोर कर दे खुद को।
अरे!, सच कहता हूँ ना चाहेगी,
तब भी मेरी हो लेगी॥



पर ध्यान भी रखना इसका कि,
कोई देख़ ना ले तुझको भीगा।
मानुष क्या है देवों की भी,
नीयत तुझ पर डोलेगी॥

हर बूँद तेरे चेहरे से गिर कर,
ख़ुद सुन्दर हो जाती है।
तुझे देख़ कर परियों की,
रानी भी रूप टटोलेगी॥



सुन ‘भोर’ कहे क्या, सुन्दरता;
तुझ-सी दुनिया में नहीं कहीं।
रूप की रानी तुझे देख़ कर,
मुँह टेढ़ा कर रो लेगी॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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