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Monday, 10 June 2019

इश्क़ की राजनीति


दर्द में हम यूँ ही मुस्कुराते रहे,
अपने जख़्मों को तुमसे छुपाते रहे।
यूँ ही चलते रहे प्रेम की तख्ती पर,
के इस मोहब्बत को तुमसे छुपाते रहे॥

दूर है तू मगर तेरा अहसास है,
मेरा दिल ये अभी भी तेरे पास है।
पूजन या है मेरी यही प्रार्थना,
के लौटने का तेरा मुझको विश्वास है॥

सोचता हूँ के उनसे मिलूँ भी कभी,
हाल दिल का उन्हें सुना दूँ कभी।
स्वप्नों में भी लगूँ आने मैं आपके,
आपकी अनुमति मुझे मिले तो कभी॥

 

तेरे माथे की उस बिन्दिया की कसम,
घूँघट में छिपे मुखड़े की कसम।
ख़्वाहिशों से यूँ ही जुड़ता हूँ आपकी,
इस ‘मैं’ से ‘हम’ में होने की कसम॥

मेरे मन के ये दीप भी बुझने लगे,
इन अँधेरों में हम भी उलझने लगे।
अब तो रातें भी अपनी-सी लगती नहीं,
चाँद की भाँति हम भी मरने लगे॥

इश्क़ की राजनीति मैं समझा नहीं,
दिन बिगड़ते गये; वो मिले ही नहीं।
दर-बदर यूँ ही व्यर्थ भटकता रहा,
के दीप ऐसे बुझे फिर जले ही नहीं॥


©निशान्त राजोरा


Posted By -  प्रभात सिंह राणा 'भोर'

Monday, 12 September 2016

मेरे गुरु, मेरे लिए

सीधे लक्ष्य पर लग जाएँ,
हमारे ये बाण।
करना मार्गदर्शन हमारा,जब तक है,
शरीर में प्राण॥

शिक्षा देकर जीवन में हमारे,
आपने अंधकार मिटाया।
हमारे भीतर आपने,
ज्ञान का दीप जलाया॥

हमारा जीवन आपने,
पल में स्वर्ग बनाया।
असफ़लता से कभी डरो नहीं,
हमें आपने यही सिखाया॥




 अँधेरे में थे हम, आपने दिखाया
रोशनी से भरा तारा।
डर का वृक्ष जड़ ले चुका था,
आपने उसे जड़ से उखाड़ा॥

जो विद्या का धन आपने हमें दिया है,
उसका कर्ज़ कैसे उतारूँ।
शीश तुम्हें झुकाता हूँ,
स्वीकार करो नमन हमारा॥


अर्जुन के लिए जो द्रोणाचार्य है,
जो मीरा का लगता रविदास है।
आपका स्थान मेरे लिये इतना खास है,
जितना शरीर में आत्मा का वास है॥

बिन आपके जीवन-सुख आया न रास है,
घनघोर अँधेरे में भी जैसे उजाले की तलाश है।
हमारे जीवन में आपका स्थान इतना खास है,
जैसे कस्तूरी के लिए हिरण की तलाश है॥

   



©शुभांकर ‘शुभ’ 
  
  

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 -प्रभात सिंह राणा 'भोर'

Monday, 15 August 2016

एक संकल्प

चलो एक संकल्प लें,
भारत को नयी पहचान दें।
हाथ-हाथ सबके साथ,
सबको एक-सा सम्मान दें॥



संकल्प भारत को आगे बढ़ाने का,
साथ ही दुनिया में छा जाने का।
चलो सदा यूँ ही साथ निभायें,
भारत का नया रूप दिखायें॥

भेदभाव सब ख़त्म करें,
दिल में नयी उमंग भरें।
जातिवाद हो जड़ से ख़त्म,
जो भारत को दे नया जन्म॥


नारी को देकर पूरा मान,
ऊँचा करें अपना अभिमान।
करके सबके हित में काम,
चलो बना दें 'मेरा भारत महान'




©शुभांकर ‘शुभ’



Posted by- प्रभात सिंह राणा 'भोर'

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Saturday, 6 August 2016

उत्तराखण्ड आपदा

बिन मौसम ये मानसून क्यों आया ?
जो संग अपने इतनी तबाही है लाया।
इस बार पहाड़ इतना क्यों रोया,
कि उसने सबका सुख-चैन है खोया॥

क्यों नदियों ने इतना उफ़ान लिया ?
कि जो आया सामने उसका विनाश किया।
क्यों नदियों ने निगले गाँव के गाँव,
तो भू-स्खलन ने क्यों तोड़े उत्तराखण्ड के पाँव॥




दैवीय आपदा से खुद देव भी न बच पाए,
केदारनाथ, बद्रीनाथ धाम भी यहाँ पानी में समाए।
शवों की क्यों नहीं हो पायी ठीक-ठीक गिनती,
क्यों प्रशासन नहीं सुन रहा पीड़ितों की विनती॥

सब पीड़ितों की आँख में देखा जा,
सकता है ये खौफ़नाक मंज़र्।
ये आपदा हमने बुलाई, हमने ही घोंपा है
पहाड़ों की पीठ में खंज़र॥




हर तरफ़ मची ये करुण चीख-पुकार,
हवाई दौरा कर क्या मजाक उड़ा रही है सरकार॥

क्यों लग रहे हैं प्रबंधन के गलत अनुमान,
दूर तलक फ़ैले हैं इस तबाही के निशान।
क्या हैं, हमारे पास इन सवालों के जवाब ?
पहाड़ों को बना के भिखारी, प्रबंधन क्यों बना बैठा है नवाब ?



©शुभांकर ‘शुभ’


उपरोक्त कविता मेरे एक अज़ीज़ मित्र के द्वारा लिखी गयी है। आपकी कविता सभी के सम्मुख रखते हुए अत्यंत खुशी महसूस कर रहा हूँ। आपके व्यक्तित्व को मैं ज्यादा नहीं जानता परंतु इतना तो आपकी कविता लेखन से स्पष्ट है कि आप चरित्र के अत्यंत सरल हैं। आप मेरे उन मित्रों की श्रेणी में शामिल हैं जिनसे मैं कभी मिला नहीं परंतु मिलने को आतुर हूँ।
“उपरोक्त कविता में लेखक के स्वयं के विचार हैं।“
धन्यवाद!


-प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Sunday, 22 March 2015

तुम थी....!

आँखों की राहत तुम थी,
हाँ, मेरी पहली चाहत तुम थी,
तुम थी चेतना में मेरी,
कल्पनाओं की आकृति तुम थी।

तुम अर्थ थी, स्पर्श थी,
तुम वेदना-संवेदना,
तुम भाव थी, अभिव्यक्ति थी,
तुम प्रेम की थी प्रेरणा।











मैं मार्ग था तुम थी दिशा,
मैं मूर्त था, तुम अर्चना,
मैं शब्द था, तुम वाणी थी,
मैं साध्य था तुम साधना।

तुम भाग्य थी, मेरा कर्म भी,
तुम गीत थी संगीत भी,
तुम नेत्र थी, तुम अश्रु भी,
तुम लक्ष्य थी, तुम जीत भी।











जग दूर था, तुम पास थी,
तम घोर था, तुम आस थी,
मैं चित्र था, तुम थी कला,
मैं बिम्ब, तुम आभास थी।

मेरी हार में मेरा बल बनी तुम,
तुम मुस्कान थी, तुम थी खुशी,
हृदय में उतरी आहट तुम थी,
हाँ......, मेरी पहली चाहत तुम थी।


©विवेक ‘उत्कंठ’


यह कविता आपके सम्मुख रखते हुए मुझे बेहद खुशी महसूस हो रही है।
उम्मीद है कि बेहद उम्दा लेखक और व्यक्तित्व द्वारा कृत यह कृति आपको पसन्द आयी होगी।

धन्यवाद...!

(wallpapers - http://www.hdwallpapers.in/ )