Saturday, 30 May 2015

सीखना है…!!!

सीखना है सिर छुपाना, सिर बचाना सीखना है,
आस पास रह के सबके पास आना सीखना है।
बचपने में थी पढ़ी, जो एकजुटता की कहानी,
फ़िर से उसे दुनिया में सबको बताना सीखना है॥


सीखना है कैसे सूरज की तपिश को कम करें,
सीखना है कैसे दारिद्रता ख़त्म करें।
सबको ही मौके दिलाना, सबको एक सा बनाना,
सीखना है कैसे, दुनिया की विषमता सम करें॥


सीखना है ये कि जलन की भावना ना रहे,
सीखना है ये व्यसन की व्यर्थ कामना ना रहे।
ध्यान रखना सीखना है, मान करना सीखना है,
सीखना है जग में स्त्री की उलाहना ना रहे॥


सीखना है ये कि पंछी पर खुले ही हैं भले,
सीखना है ये कि मन में हर घड़ी आशा रहे।
सीखना है ये की स्वयं हम ही अपने साथ हैं,
कर्म सारे हैं सरल बस भरोसे की बात है॥


याद भी रखना है इक दिन ‘भोर’ अपना रूख़ करेगी,
वह घड़ी जब ज़िंदगी भी हँस पड़ेगी सुख कहेगी।
तब ना अँधियारा रहेगा, ना अपूर्ति रह बचेगी,
लेकिन नये ‘भोर’ की उम्मीद तब भी रहेगी…॥






©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

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Sunday, 22 March 2015

तुम थी....!

आँखों की राहत तुम थी,
हाँ, मेरी पहली चाहत तुम थी,
तुम थी चेतना में मेरी,
कल्पनाओं की आकृति तुम थी।

तुम अर्थ थी, स्पर्श थी,
तुम वेदना-संवेदना,
तुम भाव थी, अभिव्यक्ति थी,
तुम प्रेम की थी प्रेरणा।











मैं मार्ग था तुम थी दिशा,
मैं मूर्त था, तुम अर्चना,
मैं शब्द था, तुम वाणी थी,
मैं साध्य था तुम साधना।

तुम भाग्य थी, मेरा कर्म भी,
तुम गीत थी संगीत भी,
तुम नेत्र थी, तुम अश्रु भी,
तुम लक्ष्य थी, तुम जीत भी।











जग दूर था, तुम पास थी,
तम घोर था, तुम आस थी,
मैं चित्र था, तुम थी कला,
मैं बिम्ब, तुम आभास थी।

मेरी हार में मेरा बल बनी तुम,
तुम मुस्कान थी, तुम थी खुशी,
हृदय में उतरी आहट तुम थी,
हाँ......, मेरी पहली चाहत तुम थी।


©विवेक ‘उत्कंठ’


यह कविता आपके सम्मुख रखते हुए मुझे बेहद खुशी महसूस हो रही है।
उम्मीद है कि बेहद उम्दा लेखक और व्यक्तित्व द्वारा कृत यह कृति आपको पसन्द आयी होगी।

धन्यवाद...!

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Tuesday, 17 February 2015

तनिक ठहर लो, ज़रा देख़ लो…

क्या दौड़ भाग है लगा रखी?
क्यों इधर-उधर तुम भटक रहे?
क्यों तथाकथित को सुन-सुनकर,
तुम कर्म भूमि में अटक रहे?
ज़रा एक बार ख़ुद को देखो,
कितने अवगुण, कितने गुण हैं।
क्यों दूजों की पोथी पढ-पढ,
मन के मन में खटक रहे?

अरे! तनिक ठहर लो ज़रा देख़ लो…











इतनी ज़ल्दी काहे की है?
धीरे कर पर अच्छा कर।
स्वयं भाग्य को सुघड़ बना कर,
नकल नहीं कुछ सच्चा कर॥
आत्मसमर्पण कर दो ख़ुद को,
एक बार अन्तर मे देख।
भीतर अपने पाओगे तुम,
गुणों सुशोभित स्वर्णिम लेख़॥


ख़ुद को नहीं तो नहीं सही,
बस क्षणिक नेत्र यह धरा देख़ लो॥


तनिक ठहर लो ज़रा देख लो!!
तनिक ठहर लो ज़रा देख लो!!





©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Wednesday, 11 February 2015

अवशेष…

ख़ोज में हूँ चल पड़ा,
मैं अपने ही अवशेष की।
न प्रमुख, न अल्पसाँख्यिक,
न किसी विशेष की॥

अपना ही प्रतिबिंब खोजूँ,
जो मैं अब हूँ खो चुका।
छोड़ इसको क्यों न सोचूँ,
होना था जो हो चुका॥


राहें कठिन हैं, या मैं निर्बल,
या सहारा चाहिये।
कालिमा मय है निशा,
कोई सितारा चाहिये॥










कहकहों वाली हँसी,
मुस्कान बन कर रह गयी।
ज़रा चर्चित थी जो वह,
पहचान थक कर ढह गयी॥

अब पुनः वही ‘भोर’ वही
साँझ कहाँ से पाऊँ?
या ऐसा जीवन, जीवन भर
यापित करता जाऊँ??



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

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Sunday, 18 January 2015

दूर खड़ी वह झाँक रही है!!! (प्रकृति)



मानव के अन्याय से पीड़ित,
बेबस औ लाचार पड़ी है।
अहम् ज़रा तू कम कर अपना,
दूर खड़ी वह झाँक रही है॥

इक – इक क़तरा उसका,
सबसे चीख – चीख कर बोल रहा।
क्यों तू मुझको नहीं संजोता,
क्यों तेरा मन डोल रहा॥


यह तेरा आलय है,
तेरा ही अपना संसार है।
मत उजाड़ कर इसको,
इसको तेरा घर परिवार है॥

तेरे सारे कर्म मूक बन,
मन ही मन वह आँक रही है।
अहम् ज़रा तू कम कर अपना,
दूर खड़ी वह झाँक रही है॥

वह अपना सर्वस्व लुटाकर,
तुझको जीवन देती है।
बदले में बस देख-रेख के,
इतर भी क्या कुछ लेती है?














पर तू इक मानव है,
तेरे कर्म सभी मानव से।
क्यों तू न समझे वसुधा के,
कृंदन वो नीरव से॥

इतना स्वार्थ देख तेरा वह,
थर-थर भय से काँप रही है।
अहम् ज़रा तू कम कर अपना,
दूर खड़ी वह झाँक रही है।



किरण 'भोर' की लिये हृदय में,
वह तन अपना ढाँप रही है।
अहम् ज़रा तू कम कर अपना,
दूर खड़ी वह झाँक रही है॥


©प्रभात सिंह राणा 'भोर'

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Saturday, 10 January 2015

किरण




प्रातः की वो काल विनाशी,
किरण चमत्कारी–सी।
सारे जग को दिशा दिखाती,
जगत करुण–हारी-सी॥

कल्प विकल्प बहुत मस्तक में,
कभी जरा मिलना हो।
अनुनय करूँ के हर ले सारी,
धुन्ध अन्धकारी-सी॥














धुन्ध जो जग में फ़ैल रही है,
ईष, द्वेष, कुण्ठा की।
सारे जग का नाश करे जो,
मानव संहारी-सी॥

‘भोर’ समय ओ किरण अजनबी,
छा जाओ वसुधा पर।
धुन्ध हटा, जीवंत बना दो,
धरती यह प्यारी-सी॥





किरण ‘भोर’ की अमृत भाँति,
है प्रेरित-कर्ता – सी।
मन के विकार भी दूर करे है,
पावन शुभकारी – सी॥

किरण वही, जो दुनिया भर में,
एक समान बिछी है।
हर मानव पर कंबल भाँति,
चंचल मतवारी – सी॥


© प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

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