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Friday, 6 October 2017

जीवन की इस भाग दौड़ में…

जीवन की इस भाग दौड़ में,
दृश्य ज़रा कम लगते हैं।
कुछ लम्हे शुष्क हैं यादों में,
कुछ स्वप्न मधुर नम लगते हैं।।

इधर दौड़ना, उधर भागना,
जीवन यही सिखाता है।
नयी चुनौतियाँ सम्मुख रख कर,
सपने नये दिखाता है।।


भूतकाल तो स्मरण में आ कर,
कुंठित मन कर जाता है।
पर इक अच्छे कल की आस में,
जीवन चलता जाता है॥

छाया-सी इस दुनिया में,
सारे ही भ्रम लगते हैं।
ग़म मिलते सबको खण्डों में हैं,
सबको पर, क्रम लगते हैं॥

गति पकड़ते जीवन में,
रिश्ते तो पीछे छूट गये।
कभी खुद को लेकर देखे थे,
वो स्वप्न मधुर सब टूट गये॥


आने वाले कल की हर पल,
फ़िक्र हृदय में रहती है।
मैं रहूँ सदा ख़ामोश बस मेरी,
परछाईं कुछ कहती है॥

वह कहती है कि रिश्ते अब तो,
कच्चे रेशम लगते हैं।
‘भोर’ में भी वह बात ना रही,
दिन भी बेदम लगते हैं॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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