Pages

Tuesday, 28 March 2017

अच्छा है…! (अतिरिक्त)

Guys this poem is the part of the previous one and makes great sense with that. Try to read the poem (titled- अच्छा है... Click to read) and try to connect both.

कभी-कभी जब दुनिया भर के,
नियम अनोखे हो जाते हैं।
तब उन सब रस्मों-नियमों को,
तोड़ भुलाना अच्छा है॥

जब अपना अतीत याद कर,
नज़रें हल्की झुक जाती हैं।
तब-तब अपने वर्तमान से,
नज़र मिलाना अच्छा है॥


 ख़्वाबों की दुनिया में बस,
अब तेरी बातें होती हैं।
शायद तुझसे ख़्वाबों में ही,
सब कह जाना अच्छा है॥

तू जहाँ-जहाँ भी जाती है,
अपनी ख़ुशबू दे जाती है।
तेरा मुझसे मिलकर, मुझको
भी महकाना अच्छा है॥

यादों से तेरी बचते-छुपते,
मेरे दिन ढलते हैं।
निशा में आ तेरा मुझ पर,
कब्ज़ा कर जाना अच्छा है॥


दुनिया के सम्मुख अपना दु:ख,
कहने से डर लगता है।
ना समझे कोई इस खातिर,
बात बनाना अच्छा है॥

‘भोर’ देख कर बीते दिन की,
बात भुलाना अच्छा है।
कुछ लम्हों को देख के यूँ ही,
नज़र चुराना अच्छा है॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Wallpapers-Wall 1,Wall 2

Guys read the poem along with the previous one (titled- अच्छा है... Click to read) and try to connect both.

Monday, 13 February 2017

तू है…

ख़ुदा की हर इबादत में तू है,
हाँ, मेरी आदत में तू है।
चैन में तू, राहत में तू है,
हाँ, मेरी चाहत में तू है॥

काम में, आराम में तू,
मधुर-भीनी शाम में तू।
खुशियों की उम्मीद तुझसे,
कर्म के अंजाम में तू॥


तृप्ति की तलाश में तू,
शान्ति की आश में तू।
‘भोर’ की शुरुआत तुझसे,
प्यार के एहसास में तू॥

हर दिन में तू, हर रात में तू,
अनकही हर बात में तू।
‘भोर’ में किरणों की भाँति,
बूँद-सी बरसात में तू॥


सत्कर्म में, गुनाह में तू,
ख़्वाहिशों की राह में तू।
बिन तेरे चंचल रहे मन,
चैन की पनाह में तू॥

रब की हर इनायत में तू है,
इश्क़ की रिवायत में तू है।
भूल में, आदत में तू है,
हाँ मेरी चाहत में तू है॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

Wallpapers-Wall1,Wall2

Monday, 16 January 2017

तुमसे क्या कहें…

कीमतें किसने लगायीं,
नाम तुमसे क्या कहें।
बिक रहे हैं कौड़ियों के,
दाम तुमसे क्या कहें॥

आज का जो फ़लसफ़ा है,
आज ही तो ख़त्म है।
कल ना जाने क्या रहे,
अंजाम तुमसे क्या कहें॥


आजकल हर कोई अपनी,
धुन में ही मशगूल है।
वक़्त का जो है मुझे,
पैगाम तुमसे क्या कहें॥

पीठ के पीछे तो हर कोई,
अलग ही सोचता है।
चल रहा जो आज,
क़त्ल-ए-आम तुमसे क्या कहें॥

मैं हर घड़ी खोया रहूँ,
जिस नाम में वह दूर है।
चल रहा है किस क़दर,
हर काम तुमसे क्या कहें॥


आज मयखाना भी महफ़िल से,
जुदा-सा लग रहा है।
फ़ीका मुझको लग रहा,
हर जाम तुमसे क्या कहें॥

‘भोर’ को आँखें दिखाता,
ये ज़माना चल रहा है।
हम तो यूँ ही हो रहे,
बदनाम तुमसे क्या कहें॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Wallpapers- Wall1,Wall2