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Saturday, 24 December 2016

आहिस्ता

तेरी ख़ातिर आहिस्ता,
शायद क़ामिल हो जाऊँगा।
या शायद बिखरा-बिखरा,
सब में शामिल हो जाऊँगा॥

शमा पिघलती जाती है,
जब वो यादों में आती है।
शायद सम्मुख आएगी,
जब मैं आमिल हो जाऊँगा॥



 पेशानी पर शिकन बढ़ाती,
जब वो बातें करती है।
नहीं पता कब होश में आऊँ,
कब क़ाहिल हो जाऊँगा॥

उसकी नज़रें दर-किनार,
मेरी नज़रों को कर देती हैं।
सारी रंजिश दूर हटाकर,
खुद साहिल हो जाऊँगा॥



वह तितर-बितर मेरे मन की,
हर ख़्वाहिश को कर देती है।
कदम बढ़ा उसकी राहों में,
मैं राहिल हो जाऊँगा॥

हर एक गुज़ारिश उसकी,
अपनी किस्मत में लिख देता हूँ।
तक़दीर मेरी भी गूँज उठेगी,
जब क़ाबिल हो जाऊँगा॥


 शब में आ कर ख़्वाबों पर,
अपना कब्ज़ा कर लेती है।
‘भोर’ तलक मैं आहिस्ता।
शायद ज़ामिल हो जाऊँगा॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


Words-
  क़ामिल- Complete
  शमा    - Candle
  आमिल- Effective
  पेशानी- Forehead
  क़ाहिल- Lazy
  साहिल- Shore/River bank
  राहिल- Traveler
  शब    - Night
  ज़ामिल- Happy


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