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Thursday, 12 July 2018

पास मेरे तुम आ जाना..!

जब चल-चल तुम थक जाओ,
तब पास मेरे तुम आ जाना।
सब जग से ठोकर पाओ,
तब पास मेरे तुम आ जाना॥

नहीं कहूँगा तुमसे कि,
जब चले गए थे आए क्यों।
सोच-सोच के इधर-उधर की,
मत घबराना, आ जाना॥


सीधी-सीधी बात कहूँगा,
तुमसे भी जब फ़िर आओगे।
बिना बात ना बात बनाना,
मत समझाना, आ जाना॥

जब जाते हो तो मन है तुम्हारा,
आओगे अपने मन से।
तब राह में यूँ ही छोड़ गए,
अब मत शरमाना, आ जाना॥

थोड़ा तो मन बिगड़ा है,
थोड़ा-सा नाराज़ भी हूँ।
थोड़ा जो नज़रें फेरूँ,
तो मत क़तराना, आ जाना॥


बात-बात में बात तुम्हारी।
अक़्सर ही कर लेता हूँ।
गर मन में कुछ बात रही हो,
बात बताना, आ जाना॥

गर तुम ने सोचा है ये,
कि तुम्हें मनाने आऊँगा।
इंतज़ार में नज़रें अपनी,
नहीं बिछाना, आ जाना॥

रोज़-रोज़ तो ऐसा कुछ,
न हो पाएगा मुझसे भी।
आते हो तो आ जाओ,
अब फ़िर से मुड़ कर ना जाना॥


‘भोर’ आशा टूटती है,
क्यों भला तुम आओगे।
मेरी आशाओं को अब,
न आज़माना, आ जाना॥

जब चल-चल तुम थक जाओ,
तब पास मेरे तुम आ जाना।
सब से जो ठोकर पाओ,
हो बुरा ज़माना, आ जाना॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Monday, 14 May 2018

तू ठहर सही, मैं आऊँगा..!

सोचा है इस बार सही, मिल कर सब कुछ कह जाऊँगा।
हाँ माना कुछ देर रही, तू ठहर सही, मैं आऊँगा॥


शायद पता है तुझको सब, पर कहना बड़ा ज़रूरी है।
मेरे मन में क्या है तू, मिल कर मैं तुझे बताऊँगा॥

मिलता रहूँगा ख़्वाबों में भी, अक़्सर तुझसे रातों में।
जब-तब फ़िर-फ़िर कई मर्तबा, मैं तेरा हो जाऊँगा॥

पहले जाने कितने मौके मैंने खूब गँवाये हैं।
इस बार यकीनन तुझको अपने दिल का हाल सुनाऊँगा॥

सोचा है इस बार सही, मिल कर सब कुछ कह जाऊँगा।
हाँ माना कुछ देर रही; तू ठहर सही, मैं आऊँगा॥


तू मेरी बातों को मन में रख के गुस्सा रहती है।
चल जाने दे, वादा है अब फ़िर से नहीं सताऊँगा॥

भोर-साँझ बस नाम तेरा ही, दिल-दिमाग में रहता है।
हाँ कुछ दिन तो और सही, पर मैं धुँधला पड़ जाऊँगा॥

खूब ख़्यालों में मिल-मिल के, तुझसे बातें की हैं मैंने।
पर शायद मैं तुझसे मिलकर सच तो न कह पाऊँगा॥

सोचा है इस बार सही, मिल कर सब कुछ कह जाऊँगा।
हाँ माना कुछ देर रही, तू ठहर सही, मैं आऊँगा॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’



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Sunday, 8 April 2018

भावना का ज़ोर..!

आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है।
एकांत में हूँ मैं लेकिन,
हर तरफ़ बस शोर है॥



धीमे-धीमे चल रही है,
लेखनी कुछ सोच कर।
लिख चुका, न मिट सकेगा,
यह विचार हर रोज़ कर॥

क्या उचित है क्या नहीं,
ये द्वंद्व मन में चल रहा।
ध्यान एकल करना चाहा,
पर ये मन चंचल रहा॥

मन भले स्थिर रहे,
व्याकुलता चहुँ ओर है।
आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है॥



यह उसे आभास है कि,
भूल अब ना माफ़ हो।
कर्म तो मैले रहेंगे,
मन भले ही साफ़ हो॥

सत्य और मिथ्या का अंतर,
फिर समय पर छोड़ कर।
लेखनी फिर चल पड़ी,
बंदिशें सब तोड़ कर॥

‘भोर’ का एहसास है,
पर उर ज़रा कमज़ोर है।
आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Monday, 26 February 2018

जब घड़ियाँ धोखा करती हैं…

साँसें रुक-रुक कर चलती-सी,
खो जाने से डरती हैं।
तेरा इंतज़ार मुश्किल,
जब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥

तेरे इंतज़ार में ही,
सारे-सारे दिन ढलते हैं।
तेरे संग जज़्बात रुकें,
तेरे संग लम्हे चलते हैं॥


तू पल भर को सामने आ,
मुझसे, मुझको ले जाती है।
और पल भर में बार-बार,
अगणित सपने दे जाती है॥

सपनों की दुनिया में आँखें,
समय को रोका करती हैं।
जब तू मुझसे मिलती है,
तब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥

तुझसे ही हर साँझ बने,
तुझमें ही रात गुजरती हैं।
तुझसे मिलने को मेरी,
हर साँस दुआएँ करती हैं॥


पर जब-जब वो मिलती है,
धड़कन कुछ थम-सी जाती है।
जब नज़र घुमाती जाने को,
तब सब संग में ले जाती है॥

‘भोर’ समय से इंतज़ार में,
आँखें खूब सँवरती हैं।
वो जब मुझसे बात करे,
सब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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