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Sunday, 8 April 2018

भावना का ज़ोर..!

आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है।
एकांत में हूँ मैं लेकिन,
हर तरफ़ बस शोर है॥



धीमे-धीमे चल रही है,
लेखनी कुछ सोच कर।
लिख चुका, न मिट सकेगा,
यह विचार हर रोज़ कर॥

क्या उचित है क्या नहीं,
ये द्वंद्व मन में चल रहा।
ध्यान एकल करना चाहा,
पर ये मन चंचल रहा॥

मन भले स्थिर रहे,
व्याकुलता चहुँ ओर है।
आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है॥



यह उसे आभास है कि,
भूल अब ना माफ़ हो।
कर्म तो मैले रहेंगे,
मन भले ही साफ़ हो॥

सत्य और मिथ्या का अंतर,
फिर समय पर छोड़ कर।
लेखनी फिर चल पड़ी,
बंदिशें सब तोड़ कर॥

‘भोर’ का एहसास है,
पर उर ज़रा कमज़ोर है।
आज मेरी लेखनी में,
भावना का ज़ोर है॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Monday, 26 February 2018

जब घड़ियाँ धोखा करती हैं…

साँसें रुक-रुक कर चलती-सी,
खो जाने से डरती हैं।
तेरा इंतज़ार मुश्किल,
जब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥

तेरे इंतज़ार में ही,
सारे-सारे दिन ढलते हैं।
तेरे संग जज़्बात रुकें,
तेरे संग लम्हे चलते हैं॥


तू पल भर को सामने आ,
मुझसे, मुझको ले जाती है।
और पल भर में बार-बार,
अगणित सपने दे जाती है॥

सपनों की दुनिया में आँखें,
समय को रोका करती हैं।
जब तू मुझसे मिलती है,
तब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥

तुझसे ही हर साँझ बने,
तुझमें ही रात गुजरती हैं।
तुझसे मिलने को मेरी,
हर साँस दुआएँ करती हैं॥


पर जब-जब वो मिलती है,
धड़कन कुछ थम-सी जाती है।
जब नज़र घुमाती जाने को,
तब सब संग में ले जाती है॥

‘भोर’ समय से इंतज़ार में,
आँखें खूब सँवरती हैं।
वो जब मुझसे बात करे,
सब घड़ियाँ धोखा करती हैं॥




©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


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Sunday, 24 December 2017

Moon - Ⅰ

You know! We’re not that different;
You and me..
Running alone through the night,
Getting stronger with every fight.

You keep revolving around your love,
Just to see her face.
And even if you are tired,
You can’t lower the pace.
Plus, with every passing night,
You try to shine a little more bright.


You see! We’re not that different;
You and me..
Running alone through the night,
Getting stronger with every fight.

I can sense the courage you gather up, day-by-day;
Till the day when she sees the complete of you.
And when you realize, there’s a distance;
One can only imagine what you’ve been through.
One day, each month, you cry your heart out;
Hiding from the world’s sight.


I guess, you understand! We’re not that different;
You and me..
Running alone through the night,
Getting stronger with every fight.

You try to come closer,
She moves further away.
I don’t think she knows,
What you’ve been trying to say.
I do understand your situation,
But others don’t see your plight.


I can now say! We’re not that different;
You and me..
Running alone through the night,
Getting stronger with every fight.


 ©Prabhat Singh Rana ‘ bhor’


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Tuesday, 14 November 2017

किरण

करुण वेदना रहती मन में,
हर पल आता उनका ध्यान।
नैन नहीं हैं जिनके; औ जो
देख न पाएँ धरती-धाम॥

क्या रहता होगा मन में उनके,
तम से भी हटकर कोई रंग?
क्या बदल लिया होगा सबने,
अपने रहने-जीने का ढंग?


क्या उनको मालूम होगा कि,
वसुधा कितनी प्यारी है?
क्या उनको भी पता है ये कि,
दुनिया कितनी सारी है?

धिक् है हम सब अँखियारों को,
नयन सहित भी नेत्रहीन हैं।
जाने क्यों न दिखते वो जो,
होते हुए भी ख़ुद में लीन हैं॥


वो सब जो ये भी न जानें,
असल में वो दिखते कैसे हैं।
वो जो ये तक जानें न, कि
दिन औ रात अलग कैसे हैं॥

क्या उनको अधिकार नहीं कि,
देखें धरती की सुंदरता?
या उनमें कुछ अलग है, जिससे
हम में नहीं है समरसता?


काश! कि उनको आँखें होतीं,
देखते वो धरती का रूप।
अन्तर भी वो पा सकते, कि
छाँव है क्या और क्या है धूप॥

उनको भी ये ज्ञात होता, कि
रंग किन्हें हम कहते हैं।
अजब रमणता है इस जग में,
यहीं जहाँ हम रहते हैं॥



©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’


इस ब्लॉग में समान शीर्षक से एक कविता पहले भी प्रकाशित हुई है, जो ब्लॉग की पहली कविता भी है, उसे पढ़ने हेतु यहाँ जाएँ - किरण 
धन्यवाद!


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